हमनें सरकार चुनी,सरकार नें हमे नहीं, हम हैं तो सरकार हैं। – सम्पादकीय

हमनें सरकार चुनी,सरकार नें हमे नहीं, हम हैं तो सरकार हैं।

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प्रधानमंत्री पद की एक गरिमा होती है जिसके प्रति सभी नागरिकों को सम्मान प्रकट करना ही चाहिये लेकिन यदि प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री जैसे महत्वपूर्ण पदों पर किसी को भी उठाकर बिठा दिया जाय जिन्हें बाज़ार में आलू,प्याज के दाम तक न मालूम हों, जिन्हें आलू, प्याज के दाम बढ़ने से कोई फर्क न पड़े और जिन्हें यह भी पता न हों कि आलू,प्याज, आदि के दाम बढ़ने, घटने से नागरिकों पर, सरकार पर, देश की अर्थव्यवस्था पर क्या असर पड़ेगा, ऐसे व्यक्तियों के प्रति आप कबतक चुप्पी साध सकते हैं और क्यों?

देश में जब भी किसान, गरीबी, बेरोजगारी, महंगाई, शिक्षा, स्वास्थ्य, सुरक्षा आदि की बात होती है सरकार समर्थक द्वारा उन्हें नागरिक मानने से ही इंकार करना या उसके एवज़ कुतर्क करना क्या यह न्यायोचित है? क्या फर्क पड़ जाएगा यदि सरकार का एक मंत्री किसानों से मिलने जाकर उनकी बातें सुन लेगा तो? उन्हें खालिस्तानी, आतंकवादी, कांग्रेसी, वामपंथी घोषित करने में जितनी ऊर्जा, खर्चा लगा रहे हैं उससे बेहतर उनकी समस्याएं सुन ली जाय। सरकार का ही कद बढ़ेगा?

यह पहला मौका नहीं बल्कि इसी सरकार में लगभग चौथी, पांचवीं बार किसानों का ऐसा बड़ा आन्दोलन हो रहा है और हर बार कोई न कोई लांछन, आरोप, कुतर्क करके सोशल मीडिया, मीडिया आदि में फैलाया जाता है। यह विषय ज्यादा सोचनीय है। यदि बार बार वाकई यह आंदोलन किसी अराजक तत्वों द्वारा चलाया जा रहा तो सरकार की खुफिया एजेंसियां क्या कर रही है? सरकार खुद क्या कर रही है? सीधे प्रधानमंत्री को सामने आकर एक एक साक्ष्य देश के सामने रखने चाहिये और इनको सीधे जेल में होना चाहिए?

इतनी अराजकता, अव्यवस्था वाली सरकार अबतक किसी भी निष्कर्ष पर नहीं पहुंची बस हर आवाज को बदनाम करके निकल जाती है। प्रधानमंत्री जैसे व्यक्ति यदि हर विषय पर यह सोचने लगे कि यह विरोधियों की चाल है या मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता कोई कुछ भी बोले तो यकीनन वह एक ऐसा व्यक्तित्व है जिसे आपकी दाल-रोटी से कोई मतलब नहीं है। वह खुश है केवल अपने किरदार से। शायद उसी का परिणाम देश की जीडीपी, बेरोजगारी एक स्पष्ट आईना है।

(अजय कुमार डिम्पल) सामाजिक कार्यकर्ता

Vairochan Media (Opc) Private Limited

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