राजधानी में शिक्षा के अधिकार की उड़ती धज्जियाँ, वंचित और कमजोर वर्गों के बच्चों लिए प्राइवेटस्कूलों के दरवाजे बंद – लोकप्रिय ख़बरें

राजधानी में शिक्षा के अधिकार की उड़ती धज्जियाँ, वंचित और कमजोर वर्गों के बच्चों लिए प्राइवेटस्कूलों के दरवाजे बंद

बच्चों के दाखिले के लिए परेशान अभिभावक लाइन में खड़े

शिक्षा के अधिकार की खुलेआम उड़ रही धज्जियां

अनिवार्य बाल शिक्षा का अधिकार अधिनियम के अंतर्गत 25 परसेंट तम न्यूनतम सीटों पर वंचित समूहों एवं कमजोर वर्ग के बच्चों के लिए प्राइवेट स्कूलों तथा केंद्रीय विद्यालयों में निशुल्क प्रवेश देना अनिवार्य है।

सरकार द्वारा फीस की प्रतिपूर्ति की व्यवस्था है बच्चे देश का भविष्य होते हैं उन्हीं पर भविष्य में देश की उन्नति निर्भर होती है उन्हें पूर्ण रूप से शिक्षित करना बालकों का ही नहीं देश की सरकार का भी कर्तव्य है बीएसए लखनऊ डॉ अमरकांत के अनुसार राजधानी लखनऊ में आरटीआई दायरे में करीब 665 स्कूल हैं।

इसमें छोटे स्कूल तो दाखिले में सहयोग कर रहे हैं लेकिन 65 ऐसे बड़े स्कूल हैं दाखिले में एकदम सहयोग नहीं कर रहे हैं गौरतलब है अगस्त आ गया है पर इन स्कूलों ने आरटीई के तहत दाखिले की सूची नहीं सौंपी है।

राइट टू एजुकेशन के तहत निजी स्कूलों की 25 परसेंट सीटों पर मुफ्त दाखिले का प्रावधान है आखिर कब तक प्राइवेट प्रबंध तंत्र के सामने उत्तरदाई लोग नतमस्तक रहेंगे और कब तक इन कमजोर तबकों के बच्चों को उनके हक से वंचित रखने का प्रयास होता रहेग।

शिक्षा का अधिकार (Right to Education) RTE क्या है ?

निशुल्क और अनिवार्य बाल शिक्षा अधिकार (आरटीई) एक्ट, 2009 के अंतर्गत 6-14 वर्ष के बीच के सभी बच्चों को अपने पड़ोस के स्कूल में प्राथमिक शिक्षा (कक्षा 1-8) प्राप्त करने का अधिकार है। आरटीई एक्ट के अन्य प्रावधानों में, प्राथमिक शिक्षा समाप्त होने तक किसी भी बच्चे को किसी कक्षा में रोका नहीं जा सकता।

अगली कक्षा में इस ऑटोमैटिक प्रमोशन से यह सुनिश्चित होता है कि पहले की कक्षा में बच्चे को न रोकने के परिणामस्वरूप वह स्कूल नहीं छोड़ता।आरटीई एक्ट के लागू होने से पहले राज्यों को नो डिटेंशन (बच्चे को पिछली कक्षा में न रोकने) नीति के संबंध में फ्लेक्सिबिलिटी मिली हुई थी। उदाहरण के लिए गोवा में कक्षा 3 तक, तमिलनाडु में कक्षा 5 तक और असम में कक्षा 7 तक बच्चे को पिछली कक्षा में नहीं रोका जाता था।

शिक्षा के अधिकार की कुछ विशेषताए

एक्ट के अंतर्गत कक्षा 8 समाप्त होने तक किसी भी बच्चे को पिछली कक्षा में रोका नहीं जाएगा। बिल इस प्रावधान में संशोधन करता है और कहता है कि प्रत्येक शैक्षणिक वर्ष के अंत में कक्षा 5 और कक्षा 8 में नियमित परीक्षा संचालित की जाएगी।

अगर बच्चा उस परीक्षा में फेल हो जाता है तो उसे अतिरिक्त शिक्षण दिया जाएगा और परिणाम घोषित होने के दो महीने के भीतर दोबारा परीक्षा देने का अवसर दिया जाएगा।

अगर बच्चा दोबारा परीक्षा में भी फेल हो जाता है तो संबंधित केंद्र या राज्य सरकार स्कूलों को इस बात की अनुमति दे सकती हैं कि वे बच्चे को पिछली कक्षा में रोक दें। इसके अतिरिक्त केंद्र या राज्य सरकार यह तय कर सकती हैं कि बच्चे को किस तरीके और किन स्थितियों में रोका जा सकता है।

सुप्रीम कोर्ट ने भी शिक्षा का अधिकार कानून पर अपनी मोहर लगाते हुए पूरे देश में लागू करने का आदेश दिया। इस अधिनियम के पारित होने से देश के हर बच्चे को शिक्षा पाने का सवैंधानिक अधिकार मिला।

इस कानून के तहत देश के हर 6 साल से 14 साल के बच्चे को मुफ्त शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार होगा। हर बच्चा पहली से आठवीं तक मुफ्त और अनिवार्य रूप से पढ़ेगा। सभी बच्चों को अपने आस-पास के स्कूल में दाखिला लेने का अधिकार होगा।

निजी स्कूलों में शिक्षा का अधिकार 25 फीसदी सीटें होती हैं आरक्षित

आरटीई में स्कूल जिले के मुख्य शिक्षा अधिकारी को मान्यता के लिए स्वघोषणा पत्र भरकर देते हैं। इसमें वे यह घोषणा करते हैं कि उनके स्कूल की प्रारंभिक कक्षा में कितनी सीटें हैं। इस सीट के 25 फीसदी सीटें आरटीई के लिए आरक्षित रखी जाती हैं।

ऐसे बच्चे हैं पात्र

शिक्षा के अधिकार के तहत निजी स्कूलों में ऐसे अभिभावक जिनकी वार्षिक आय 55 हजार रुपए या उससे कम है, बच्चों का प्रवेश करा सकते हैं। अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, पिछड़ा वर्ग, अनाथ बच्चे, शारीरिक रूप से विकलांग, विधवा और तलाकशुदा माता पर आश्रित बच्चे भी प्रवेश पाने के हकदार हैं।

‘‘अनएडेड प्राइवेट स्कूल्स एसोसिएशन’’ का ऐलान RTE के तहत राजधानी लखनऊ में नहीं देंगे दाखिला

उत्तर प्रदेश के निजी स्कूलों के संगठन ‘‘अनएडेड प्राइवेट स्कूल्स एसोसिएशन’’ ने शिक्षा का अधिकार (आरटीई) कानून के तहत गरीब परिवारों के और बच्चों को दाखिला देने से साफ इनकार कर दिया है। संगठन के अध्यक्ष अनिल अग्रवाल ने कहा कि राज्य सरकार ने छह साल से आरटीई के तहत दाखिला लेने वाले छात्रों की फीस प्रतिपूर्ति नहीं की है।

इसलिये निजी स्कूल 2019-2020 के शैक्षणिक सत्र में इस कानून के तहत किसी छात्र को दाखिला नहीं देंगे। अग्रवाल ने हालांकि यह कहा कि जिन बच्चों का पहले आरटीई कानून के तहत दाखिला हुआ है उन्हें स्कूलों से निकाला नहीं जायेगा। उन्होंने बताया कि कुछ स्कूलों को सरकार ने प्रति छात्र 450 रुपये का भुगतान किया है जो आरटीई कानून और 2012 में उच्चतम न्यायालय के निर्देशों की अवहेलना है। 

Report : Akhilesh Singh

Vairochan Media (Opc) Private Limited

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