‘देशबंदी में हम क्या खाएंगे, मेरे बच्चे भूखों मर जाएंगे’, डेली वर्कर्स से लेकर रेहड़ी-पटरी और कंस्ट्रक्शन मजदूरों की यह है पीड़ा।

‘देशबंदी में हम क्या खाएंगे, मेरे बच्चे भूखों मर जाएंगे’, डेली वर्कर्स से लेकर रेहड़ी-पटरी और कंस्ट्रक्शन मजदूरों की यह है पीड़ा।

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लॉकडाउन की मार सबसे ज्यादा दिहाड़ी मजदूरों पर पड़ी है। दरअसल लॉकडाउन से उनके सामने दो वक्त की रोटी का संकट खड़ा हो गया है।

एक दिहाड़ी मजदूर जो कबाड़ इकट्ठा करके या फिर कंस्ट्रक्शन साइट पर मजदूरी करके अपने परिवार का पेट भरता है। या फिर शहर के स्लम में रहने वाले जो कूड़ा उठाकर अपना परिवार चलाते है।

लखनऊ मानसरोवर कॉलोनी इलाके में झुग्गी झोपड़ी में रहने वाले लोगो का कहना है सरकार ने कोरोना वायरस के चलते 31 मार्च तक राज्य में लॉकडाउन लागू किया हुआ है अब हमारे सामने अपने 9 सदस्यों के परिवार का पेट भरना मुश्किल हो गया है।

द नेटिजन न्यूज़ के साथ बातचीत में यहां स्लम में रहने वाला एक परिवार का मुखिया ने बताया कि “हम आज चौकड़ी (दिहाड़ी मजदूरों के इकट्ठा होने की एक जगह, जहां उन्हें काम मिलता है) गए थे लेकिन पुलिस ने हमें भगा दिया। उन्होंने हमें घर पर रहने को कहा है।

अगर हम अपने घर रहेंगे तो हमारे परिवारों को कौन पालेगा? हम हर दिन की कमाई पर निर्भर हैं। हमारे पास कोई बचत नहीं है।”

“झुग्गी झोपड़ी में रहने वाले लोगों को अभी तक सरकार की तरफ से कोई मदद नहीं मिली है। कुछ लोग हमें चावल और अनाज दान कर देते हैं। ऐसे में हम पूरी तरह से अब दान पर निर्भर हो गए हैं।”


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