आरक्षित पदों अभ्यार्थियों को अयोग्य ठहरना उनके हक़ पर ठाका डालने की शाजिस ताकि वे बराबरी पर न आ सके

आरक्षित पदों अभ्यार्थियों को अयोग्य ठहरना उनके हक़ पर ठाका डालने की शाजिस ताकि वे बराबरी पर न आ सके

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कहने को तो देश 70 साल पहले आजाद हो गया आजादी के बाद सभी समुदाय और वर्ग को सरकारी और पब्लिक सेक्टर में बराबर का हक़ मिले इसके लिए संविधान में बकैयादा लिखित कानून बना।

लेकिन दुर्भाग्य आज भी समाज के आरक्षित वर्ग के लोगो को उनका हक़ नहीं मिला है। मंडल कमीशन लागू किए जाने के दो दशक बाद भी केंद्रीय सरकारी नौकरियों में ओबीसी समुदाय 27% की निर्धारित भागीदारी को पाने में सफल नहीं हुआ है।

सभी नौकरियों में मिलाकर देखा जाये तो शायद यह अब तक 10 % की भागीदारी ही प्राप्त कर सका है। बाकि आरक्षित पदों पर अवैध तरीके से किसी आरक्षित वर्ग लोग बैठे है।

2016 को विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने देश के सभी केंद्रीय विश्वविद्यालयों को एक चिट्ठी भेजी है। चिट्ठी के माध्यम से यूजीसी ने केंद्रीय विश्वविद्यालयों को कहा है कि वे एसोसिएट प्रोफेसर और प्रोफेसर पदों पर अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) को आरक्षण न दें।

पत्र में यह भी स्पष्ट किया गया है कि अनुसूचित जाति और जनजाति को पूर्व की भांति असिस्टेंट प्रोफेसर, एसोसिएट प्रोफेसर और प्रोफेसर- तीनों स्तरों पर आरक्षण का लाभ पूर्ववत् मिलता रहेगा।

2011 की वह घटना याद आई, जिसमें जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में एसोसिएट प्रोफेसर और प्रोफेसर पद के लिए कुछ रिक्तियां घोषित की गईं थीं, जिसमें अनुसूचित जाति और जनजाति के लिए तो ये पद आरक्षित थे लेकिन ओबीसी को इससे वंचित रखा गया था।

आखिर इन घटनाओ को देखो तो यह के षड्यंत्र नहीं तो और क्या है ? आखिर जब संविधानिक नियमानुसार पदों की संख्या निर्धारित है तो उनको पद न देने के हज़ार बहाने खोजे जाते है।

व्यक्ति ने भेद पर उनके व्यवसाय पर कब्ज़ा

अन्य पिछडा वर्ग में शामिल अधिकांश जातियां शूद्र रही हैं, जिनका मूल पेशा खेती-बाडी, पशुपालन व विभिन्न प्रकार की कारिगरियां रही हैं। इसी तबके ने अपने उत्पादनों से देश का निर्माण किया है।

प्राचीन काल का इतिहास उठाएं या मध्यकाल काल का तो पता चलता है। इस तबके ने एक से बढ़कर एक क्रांतिकारी संतों तथा विलक्षण मस्तिष्क के धनी दार्शनिकों, विद्वानों को पैदा किया है।

लेकिन आज इनके रोजी-रोजगारों पर सवर्ण जातियों ने कब्जा कर लिया है। आज डेयरी उद्योग किसके हाथ में है? क्या यह यादवों के पास है? यादव तो वहां सिर्फ कनस्तरों में दूध पहुंचाने वाले बन गये हैं।

आज सब्जी का का व्यापार कोयरी-कुर्मी नहीं रिलायांस सहित बडी-बडी बहुराष्ट्रीय कंपनियां कर रही हैं। शहरों में बाल काटने के सैलून और चमकते-दमकते ब्यूटी पार्लर किसके हैं? क्या वे नाईयों के हैं? नहीं, नाई तो अब बस वहां दिहाडी मजदूर हैं। उन्हें दिन के हिसाब से ‘सैलरी‘ मिलती है। एक दिन भी नहीं आए तो ‘सैलरी‘ काट ली जाती है।

फर्नीचरों की जो विशाल दुकानें दिखती हैं और वहां मालिक की विशालकाय गद्देदार कुर्सी पर जो बडी सी तोंद वाले आदमी बैठे दिखते हैं, क्या वे बढई हैं? बुनकर, तेली, चुडीहारा, भडभूंजा, नोनिया, धानुक, कबाडी, चैरसिया, कहार, पंसारी, भिश्ती, दर्जी, कलवार, चिडीमार आदि समेत जो 5000 हजार जातियां आज ओबीसी की सूची में हैं, उनमें से लगभग सभी का परंपरागत रोजगार उदारीकरण का सब्जबाग दिखाकर सवर्णों द्वारा छीना जा चुका है।

सबसे बड़ा खेल

वास्तविकता यह है कि एसोसिएट प्रोफेसर और प्रोफेसर के पद भी इंट्री लेवल के ही पद हैं, क्योंकि इन पदों के लिए भी सीधी नियुक्तियां होती हैं तथा इनके लिए अलग से पूरी नियुक्ति प्रकिया अपनायी जाती है व साक्षात्कार आदि होते हैं।

इन पदों के लिए प्रायः कुछ वर्षों तक शिक्षण अनुभव मांगा जाता है, लेकिन पोस्ट डाक्टरेट की उपाधि प्राप्त उम्मीदवार तथा विशिष्ट योग्यता वाले उम्मीदवारों को बिना किसी शिक्षण अनुभव के ही इन पदों के उम्मीदवार होते हैं।

‘शिक्षण का अनुभव‘ कुतर्क के अलावा और कुछ नहीं है। अस्टिटेंट प्रोफेसर के पद के लिए भी शिक्षण के अनुभव के आधार पर अतिरिक्त अंक दिये जाते हैं। तो क्या उन्हें भी इंट्री लेवल का पद नहीं माना जाएगा?

केद्रीय विश्वविद्यालयों की स्थिति

केद्रीय विश्वविद्यालयों में वर्ष 2011 में देश भर के अन्य पिछडा वर्ग से आने वाले केवल चार प्रोफेसर थे। अस्टिटेंट प्रोफेसर के कुल 7078 पदों में से ओबीसी के केवल 233 लोग थे (चार्ट देखें)।

अगर आप इन यूनिवर्सियों के गलियारों में घूमते हों तो जानते होंगे कि यहां समान्य श्रेणी के पदों को सवर्णों के आरक्षित माना जाता है।

नेट परीक्षा और अन्य परीक्षा में ओबीसी आगे फिर NFS क्यों ?

आप नेट की परीक्षा के परिणाम देखें, आपको सामान्य श्रेणी में बडी संख्या में ओबीसी मिलेंगे। विश्वविद्यालयों में नामांकन के लिए होने वाली लिखित परीक्षाओं के परिणाम देखें, वहां भी आपको न सिर्फ सामान्य श्रेणी में ओबीसी दिखेंगे बल्कि उन्हें आप टॉप टेन के अनेक स्थानों पर भी अपनी प्रतिभा के बूते स्थान पाते हुए आसानी से देख सकते हैं।

आप समझ सकते हैं कि प्राध्यापक पद की नियुक्तियों के दौरान ऐसा क्या घटित हो जाता है कि सामान्य श्रेणी के लिए सारे से सारे सवर्ण उम्मीदवार ही योग्य पाये जाते हैं?

दरअसल, सामान्य श्रेणी के पदों के लिए आयोजित परीक्षा, जो कि महज एक साक्षात्कार पर आधारित होती है, में केवल सवर्ण उम्मीदवार ही भाग लेते है। अगर कोई दलित, आदिवासी और ओबीसी उम्मीदवार अपनी जाति छुपा कर ‘सामान्य‘ श्रेणी में

आवेदन कर डाले और यह बात इन विश्वविद्यालयों के भाग्य विधाताओं को पता लग जाए तो वे इसे घनघोर छल मानते हैं।

दरअसल, सामान्य श्रेणी के पदों के लिए आयोजित परीक्षा, जो कि महज एक साक्षात्कार पर आधारित होती है, में केवल सवर्ण उम्मीदवार ही भाग लेते है।

अगर कोई दलित, आदिवासी और ओबीसी उम्मीदवार अपनी जाति छुपा कर ‘सामान्य‘ श्रेणी में आवेदन कर डाले और यह बात इन विश्वविद्यालयों के भाग्य विधाताओं को पता लग जाए तो वे इसे घनघोर छल मानते हैं।

इस प्रकार अभी अस्टिेंट प्रोफेसर के पद पर सवर्णों के लिए 50 प्रतिशत आरक्षण है तथा यूजीसी द्वारा जारी उपरोक्त पत्र के बाद एसोसिएट प्रोफेसर व प्रोफेसर के पद पर 50 फीसदी सवर्ण और 27 फीसदी ओबीसी के आरक्षण को मिलाकर कुल 77 फीसदी पद सवर्ण समुदाय के लिए आरक्षित हो गये हैं।

जिस ‘अस्टिटेंट प्रोफेसर‘ पद पर कथित रूप से ओबीसी तबके को 27 फीसदी आरक्षण दिया जा रहा है, उसमें भी बडे पैमाने पर धांधली हो रही है। दिल्ली विश्वविद्यालय में तो आरक्षण रोस्टर का खुले तौर पर उल्लंघन हो रहा है। रोस्टर के अनुसार जो सीट ओबीसी की है उस पर तदर्थ रूप ( ऐड –हॉक) से गैर-ओबीसी पढा रहे हैं।


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