जो कहते थे भारत तो विश्व अर्थव्यवस्था का चमकता सितारा है आज क्यों चुप ? आकार पटेल – News

जो कहते थे भारत तो विश्व अर्थव्यवस्था का चमकता सितारा है आज क्यों चुप ? आकार पटेल

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भारत में बीते 5 साल के दौरान कारों की बिक्री में कोई खास इजाफा नहीं हुआ है। 2015-16 में भारतीयों ने कोई 27 लाख कारें खरीदी थीं। और 2019-20 में भी बिकने वाली कारों की संख्या 27 लाख ही है।

इसका एक अर्थ तो यह निकलता है कि भारत के मध्यवर्ग का विकास बिल्कुल नहीं हो रहा है या फिर वह खर्च ही नहीं कर रहा है।


सरकार कहती है कि कारों की बिक्री में कोई वृद्धि न होना कोई समस्या नहीं है क्योंकि लोग अब टैक्सी (ओला, उबर) आदि का इस्तेमाल करने लगे हैं। अमेरिका में पिछले साल 2 करोड़ कारों की बिक्री हुई, इससे जाहिर है कि ओला या ऊबर से किसी देश में कारों की बिक्री पर कोई फर्क नहीं पड़ा है।

देश में दोपहिया वाहनों की बिक्री में भी बीते 4 साल के दौरान कोई वृद्धि नहीं हुई है। 2016-17 में देश में 1.7 करोड़ दोपहिया वाहन बिके थे, और 2019-20 में भी इनकी बिक्री की संख्या 1.7 करोड़ ही है।


दोपहिया वाहन को निम्न मध्य वर्ग का वाहन मान जाता है, इनकी बिक्री न बढ़ने का अर्थ है कि निम्न मध्य वर्ग भी दबाव में है और उसका भी बीते चार साल में विकास नहीं हुआ है।

इस पर सरकार का क्या रुख है हमें नहीं पता, क्योंकि सरकार तो मानती ही नहीं है कि विकास नहीं हो रहा है।


कमर्शियल वाहनों (ट्रक, बस आदि) की बिक्री में कोई इजाफा नहीं हो रहा है। बीते चार साल के आंकड़े देखें तो 2016-17 में 7 लाख वाहन बिके थे, जबकि 2019-20 में भी इनकी बिक्री का आंकड़ा 7 लाख ही है।

कमर्शियल वाहनों में ट्रकों की संख्या अधिक होती है और ये वे वाहन हैं जो कच्चे सामान को फैक्टरी और तैयार सामान को बाजार में पहुंचाते हैं। यानी बाजार में बीते चार साल में जीरो ग्रोथ हुई है।


यही हाल रियल एस्टेट का है जहां बीते साल से शून्य ग्रोथ है। भारतीयों ने 2016 में करीब 2 लाख करोड़ रुपए रियल एस्टेट में लगाए, वहीं 2019 में भी यह आंकड़ा 2 लाख करोड़ ही है। देश के निर्यात यानी एक्सपोर्ट की बात करें, तो बीते 6 साल में देश ने उतना ही माल देश के बाहर भेजा है जितना मनमोहन सरकार ने दौर में भेजा जाता था।

मनमहोन सिंह सरकार का कार्यकाल जब खत्म हुआ तो उस वक्त भारत करीब 300 अरब डॉलर सालाना का एक्सपोर्ट करता था। 2019-20 के आंकड़े देखें तो भारत ने 300 अरब डॉलर का ही एक्सपोर्ट किया है।


ऐसा क्यों है? हम नहीं जान सकते क्योंकि सरकार इस बारे में बात ही नहीं करती है। इतना ही नहीं जब भारत में निर्यात के मुकाबले आयात कम हुआ तो सरकार ने तो बाकायदा इसका जश्न मनाया और इसे अपनी उलब्धि माना।

देश में रोजगार में भी बीते 6 साल में कोई तरक्की नहीं हुई है, दरअसल इसमें तो गिरावट ही दर्ज हुई है। एक सरकारी रिपोर्ट में बताया गया है कि देश में बेरोजगारी की दर 6 फीसदी है, जोकि इतिहास में कभी इतनी नहीं रही।

आखिर भारतीयों के रोजगार क्यों खत्म हो रहे हैं या उनकी नौकरियां जा रही हैं। हमें नही पता क्योंकि सरकार तो पकोड़ा बेचने का आडिया देकर या उबर ड्राइवर बनने की सलाह देकर अपना पल्ला झाड़ लेती है।

निस्संदेह कोविड से देश की अर्थव्यवस्था पर जबरदस्त असर पड़ा है और आने वाले दिनों में भी इसका असर दिखेगा। इस साल जनवरी में देश की जीडीपी ग्रोथ जितनी थी उसे हासिल करने में ही कम से कम तीन साल का वक्त लग जाएगा।

यानी जब तक मोदी का दूसरा कार्यकाल खत्म होगा तो देश की अर्थव्यवस्था वहां होगी जहां इस साल जनवरी में थी। समस्या यह है कि इस साल जनवरी में हम जहां थे, वह कोई आदर्श या अच्छी स्थिति नहीं थी। और मैंने ऊपर जितने भी आंकड़े सामने रखें हैं वह सब कोविड के आगमन से पहले के हैं।

हमारी अर्थव्यवस्था में सिकुड़न या ठहराव तो लॉकडाउन से पहले ही आ चुका था और इसका मौजूदा संकट से बहुत लेना-देना नहीं है। अगर हम कोविड की समस्या से उबर भी आए तो भी हम अर्थव्यवस्था के उसी संकट में खड़े होंगे जहां पहले थे।


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