कंपनियों को दीवालिया होने से बचाने के लिए सरकार ने नई इन्सॉल्वेंसी प्रक्रियाओं पर 1 साल तक की रोक लगाने का फैसला किया

कंपनियों को दीवालिया होने से बचाने के लिए सरकार ने नई इन्सॉल्वेंसी प्रक्रियाओं पर 1 साल तक की रोक लगाने का फैसला किया

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नई दिल्ली. सरकार ने इन्सॉल्वेंसी एंड बैंक्रप्शी कोड (आईबीसी) के तहत नई इन्सॉल्वेंसी प्रक्रियाओं पर अगले 1 साल तक के लिए रोक लगाने का फैसला किया है।

सूत्रों ने कहा कि केंद्रीय मंत्रिमंडल ने बुधवार को यह फैसला किया। सरकार के इस कदम से उद्योग जगत को बड़ी राहत मिलेगी। नए कोरोनावायरस की महामारी के कारण कंपनियों का कारोबार बुरी तरह से प्रभावित हुआ है।

सरकार ने आईबीसी-2016 कानून में संशोधन करने का फैसला किया है। इसके लिए एक अध्यादेश लाया जाएगा।

अध्यादेश के तहत आईबीसी-2016 की धारा 7, 9 और 10 को पहले 6 माह के लिए नीलंबित कर दिया जाएगा।

नीलंबन की अवधि को बाद में 1 साल तक के लिए बढ़ाया जा सकता है। इस अवधि को बढ़ाने का प्रावधान भी अध्यादेश में रहेगा। जिस दिन अध्यादेश जारी होगा, उसी दिन से कानून में संशोधन प्रभावी हो जाएगा। आईबीसी कानून में अस्थायी संशोधन से बैंकों को अपने लोन को रिस्ट्रक्चर करने का मौका मिल जाएगा।

धारा 7, 9 और 10 में क्या है प्रावधान

इन तीनों धाराओं के जरिये कर्जदाताओं को यह अधिकार दिया गया है कि वे कर्ज का भुगतान करने में असफल रहने वाली कंपनियों (डिफॉल्टर्स) के खिलाफ नेशनल कंपनी लॉ ट्र्रिब्यूनल्स (एनसीएलटी) में जा सकते हैं।

धारा 7 : यह धारा वित्तीय कर्जदाताओं (फाइनेंस उपलब्ध कराने वाले संस्थान) को डिफॉल्टर्स के खिलाफ कॉरपोरेट इन्सॉल्वेंसी रिजॉल्यूशन प्रोसेस शुरू करने का अधिकार देता है।

धारा 9 : यह धारा संचालन कर्जदाताओं (आपूर्तिकर्ता कंपनियों) को डिफॉल्टर्स के खिलाफ इन्सॉल्वेंसी प्रक्रिया शुरू करने के लिए आवेदन करने का अधिकार देता है।

धारा 10 : यह धारा डिफॉल्ट करने वाली कंपनी (कॉरपोरेट डेटर) को कॉरपोरेट इन्सॉल्वंसी रिजॉल्यूशन प्रोसेस में प्रवेश करने के लिए आवेदन करने का अधिकार देता है।

90 दिनों तक कर्ज का भुगतान नहीं करने वाली कंपनी को समाधान के लिए भेजा जाता है

मौजूदा नियम के तहत यदि कोई कंपनी 90 दिनों से ज्यादा समय तक लोन की किस्त का भुगतान नहीं करती है, तो कर्जदाता को उस कंपनी को या तो आईबीसी के तहत समाधान करने के लिए भेजना होता है या भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) की अनुमति से किसी अन्य प्रक्रिया में भेजना होता है।

90 दिनों तक भुगतान नहीं होने पर कर्जदाता के पास लोन को रिस्ट्र्रक्चर करने का विकल्प नहीं होता है। मार्च में सरकार ने इन्सॉल्वेंसी प्रक्रिया के लिए न्यूनतम डिफॉल्ट राशि की सीमा को एक लाख रुपए से बढ़ाकर 1 करोड़ कर दिया था।

यह सीमा इसलिए बढ़ाई गई थी, ताकि छोटी-मझोली कंपनियों को इन्सॉल्वेंसी प्रक्रिया में जाने से बचाया जा सके। लॉकडाउन के कारण कई छोटी-मझोली कंपनियां परेशानियों का सामना कर रही हैं।

उद्योग जगत भी सरकार से कर रहा था मांग

उद्योग जगत सरकार से नई इन्सॉल्वेंसी प्रक्रिया को स्थगित किए जाने की मांग कर रहा था। क्योंकि नए कोरोनावायरस और देशव्यापी लॉकडाउन के कारण वे कारोबार नहीं कर पा रही हैं और उन्हें कर्ज का भुगतान करने में परेशानी हो रही है। इसस पहले एचडीएफसी बैंक के मुख्य अर्थशास्त्री अभीक बरुआ ने कहा था कि मौजूदा संकट में यह कदम जरूरी है।


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