सतीश महाल्दर की अगुवाई वाले एक संगठन ‘रिकंसीलिएशन, रिलीफ एंड रिहैबिलिटेशन’ ने अनुच्छेद 370 की बहाली की मांग उठा दी है। – News

सतीश महाल्दर की अगुवाई वाले एक संगठन ‘रिकंसीलिएशन, रिलीफ एंड रिहैबिलिटेशन’ ने अनुच्छेद 370 की बहाली की मांग उठा दी है।

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प्रवासी कश्मीरी पंडितों के एक संगठन ने भारत सरकार से जम्मू और कश्मीर के लिए राज्य का दर्जा और विशेष दर्जा बहाल करने को कहा है। सुलह, राहत और पुनर्वास नाम के संगठन ने मांग की है कि 5 अगस्त को भारत सरकार द्वारा उसके अपहरण के एक वर्ष पूरा होने से पहले जम्मू और कश्मीर में अनुच्छेद 370 को बहाल किया जाए।

“हम जम्मू और कश्मीर को राज्य का दर्जा और विशेष दर्जा बहाल करने की मांग करते हैं। भारतीय संविधान के अनुसार हर व्यक्ति को समानता का अधिकार सुनिश्चित करता है व्यक्तियों, समुदायों, धर्मों, क्षेत्रों और सभी सामाजिक और राजनीतिक सभी क्षेत्र में यह लागू होता है । समानता का अधिकार धर्म, जाति, क्षेत्र या किसी अन्य सामाजिक और राजनीतिक उप-श्रेणियों के आधार पर गैर-भेदभाव सुनिश्चित करता है। इससे पहले कभी भी किसी राज्य को डाउनग्रेड नहीं किया गया है। लोकतंत्र में ऐसा नहीं किया जाता है। एक राजनीतिक स्थिति के लिए एक सैन्य समाधान नहीं हो सकता है और अपने ही लोगों के साथ युद्ध के मुँह में नहीं ढकेला जा सकता है “

‘रिकंसीलिएशन, संगठन में कश्मीरी ’पंडित’ शामिल हैं, जो खुद में एक अत्यधिक अस्पष्ट अभिव्यक्ति है क्योंकि इस शब्द का इस्तेमाल कश्मीर के शैव पंच गौड़ सारस्वत ब्राह्मणों को इंगित करने के लिए किया जाता है।

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किसी के इनमें से एक या सभी विशेषताओं के साथ अपनी पहचान बताने में कुछ गलत भी नहीं है। लेकिन ऐसे व्यक्ति और संगठन हैं जो भिन्न होने का दावा करते हैं और शेष भारतीयों को कश्मीर से बाहर रखने के लिए अनुच्छेद 370 की बहाली की मांग करते हैं।

समूह ने प्रधानमंत्री, गृह मंत्री और सरकार से अपील करते हुए कहा है, “जम्मू-कश्मीर के लोग आपके अपने थे, उन्हें प्यार करते थे। एक अच्छे संकेत के रूप में, जम्मू और कश्मीर को विशेष दर्जा देते हैं। प्रतिनिधि / सांसद लोगों के लिए, लोगों द्वारा और उन्हें लोगों की आकांक्षा और इच्छाओं को समझने की जरूरत है।

फैसले में बदलाव मुमकिन नहीं

सुप्रीम कोर्ट में मोदी सरकार के फैसले की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाले अधिकांश मामले जम्मू-कश्मीर की विशिष्टता बनाए रखना चाहते हैं और शेष भारत के साथ इसके मनोवैज्ञानिक, भावनात्मक और आर्थिक एकीकरण को अस्वीकार करते हैं।

केंद्र का प्रतिनिधित्व करने वाले अटॉर्नी जनरल ने सुप्रीम कोर्ट से कहा है कि ‘अनुच्छेद 370 के प्रावधान खत्म किया जाना अब एक निष्पादित कार्य बन चुका है, जिस बदलाव को स्वीकार करना ही एकमात्र विकल्प है.’ यह हलफनामा प्रधानमंत्री मोदी के शब्दों को ही स्पष्ट रूप से दोहराता है. उन्होंने अपने निर्वाचन क्षेत्र वाराणसी में लोगों को संबोधित करते हुए कहा था, ‘दुनिया भर के सारे दबावों के बावजूद, इन फैसलों पर हम कायम हैं और कायम रहेंगे.’

‘राष्ट्र के हित में’ अपने फैसलों पर मजबूती से आगे बढ़ने के प्रधानमंत्री मोदी के संकल्प और संसद में भाजपा के संख्याबल को देखते हुए अगस्त 2019 के इस फैसले में किसी बड़े उलटफेर की संभावना शून्य है.

अनुच्छेद 370 को एक अस्थायी प्रावधान के तौर पर लाया गया था जिसका उद्देश्य विभाजन, पाकिस्तान के सैन्य आक्रमण और अतिक्रमण के कारण अशांत राज्य में भारतीय संविधान के प्रावधानों को लागू करने का प्रक्रियात्मक तंत्र बनाना था.

लेकिन राजनीतिक तत्वों ने इस प्रावधान का दुरुपयोग शुरू कर दिया और इसकी आड़ में राज्य सरकार के कई कदमों पर अमल में तरह-तरह की अड़चनें पैदा की गईं. सूचना का अधिकार (आरटीआई), शिक्षा का अधिकार (आरटीई), भ्रष्टाचार निरोधक और एससी/एसटी/ओबीसी आदि से जुड़े कानूनों सहित 130 से अधिक कानूनों को जम्मू-कश्मीर के दायरे से बाहर रखकर वहां के लोगों को उनके वैधानिक अधिकारों से वंचित रखा गया.

यही सब जम्मू-कश्मीर और शेष भारत के बीच एक दीवार बने अनुच्छेद 370 के खिलाफ खड़े होने की वजह बना, जो इसे खत्म करने के लिए एक सर्वसम्मत समर्थन था. यह दीवार ढहने के साथ अब किसी भी भारतीय नागरिक के लिए जम्मू-कश्मीर में बसना और उसके विकास में योगदान देना संभव है. और इसलिए, एक साल पहले वाली स्थिति में लौटने का सवाल ही नहीं उठता.


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