नई शिक्षा नीति ग्रामीण इलाकों में लड़कियों की स्कूल वापसी करा पायेगी – News

नई शिक्षा नीति ग्रामीण इलाकों में लड़कियों की स्कूल वापसी करा पायेगी

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केंद्र सरकार ने बुधवार को नई शिक्षा नीति-2020 को मंज़ूरी दे दी जिसमें स्कूली शिक्षा से लेकर उच्च शिक्षा में कई तरह के बदलाव किए गए हैं। इसमें शिक्षा पर सरकारी ख़र्च को 4.43% से बढ़ाकर सकल घरेलू उत्पाद का छह फ़ीसद तक करने का लक्ष्य है।

मानव संसाधन विकास मंत्रालय के मुताबिक़, हर साल 16.88% लड़कियाँ आठवीं के बाद स्कूल छोड़ देती हैं।

इनमें से कई लड़कियाँ कम उम्र में शादी करने के लिए मजबूर की जाती हैं। कम उम्र में माँ बनने की वजह से कई लड़कियों की असमय मौत हो जाती हैं।

कोरोना वायरस महामारी लड़कियों को स्कूल से दूर करती दिख रही है। ऐसे समय में केंद्र सरकार की ओर से लाई गई राष्ट्रीय शिक्षा नीति एक ताज़ा हवा के झोंके जैसी है।

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नई शिक्षा नीति के तहत लड़कियों और ट्रांसजेंडर समुदाय के लिए ‘लिंग समावेशन निधि’ का गठन किया जाएगा। इस नीति का उद्देश्य प्राथमिक विद्यालय से लेकर माध्यमिक स्तर तक सभी बच्चों को शिक्षा उपलब्ध कराना है।

सरकार इसे एक ‘ऐतिहासिक उपलब्धि’ बता रही है लेकिन शिक्षा क्षेत्रों के विशेषज्ञ इस नीति में तय किये लक्ष्यों की प्राप्ति को लेकर आश्वस्त नज़र नहीं आते।

वर्ल्ड बैंक की एक रिपोर्ट के मुताबिक़, लड़कियों के स्कूल छोड़ने के पीछे सरकारी स्कूलों की ख़राब हालत और भारी फीस बड़ी वजह समझी जाती है।

साल 2018 में तत्कालीन एचआरडी मिनिस्टर (राज्य प्रभार) उपेंद्र कुशवाहा ने राज्य सभा में ये जानकारी दी थी कि प्रत्येक वर्ष 16.88 फीसदी लड़कियां स्कूल छोड़ देती हैं।

एनएसएसओ के सर्वे (पेज 107) में लड़कियों के स्कूल छोड़ने की वजहों की पड़ताल की गई है जिसके मुताबिक़ कम उम्र में शादी, स्कूल दूर होना और घर के कामकाज में लगना स्कूल छोड़ने की बड़ी वजहें हैं।

संसद को शिक्षा का अधिकार क़ानून में संशोधन करके इस नीति को उसका हिस्सा बनाना होगा जिससे अपने अधिकारों का उल्लंघन होने पर वे अदालत की शरण में जा सके।

लेकिन ये सब कुछ करने के लिए सरकार को भारी आर्थिक निवेश करना होगा और वर्तमान शिक्षा बजट में भी इजाफ़ा करने की ज़रूरत होगी।

ये सब होता दिख नहीं रहा है क्योंकि भारत सरकार साल दर साल अपने शिक्षा बजट को घटाती जा रही है।

अंग्रेज़ी न्यूज़ वेबसाइट ‘इंडिया स्पेंड’ की एक रिपोर्ट के अनुसार साल 2014-15 में सरकार ने 38,607 करोड़ रुपये खर्च किए थे, तो साल 2019 तक आते-आते ये बजट 37 हज़ार करोड़ रुपये हो गया। बीच के दो सालों में सरकार ने स्कूली शिक्षा पर सिर्फ़ 34 हज़ार करोड़ रुपये खर्च किया।

अध्यापकों की बात करें तो प्राथमिक स्तर पर ही 9 लाख पद खाली पड़े हैं।सेकेंडरी स्तर पर कहीं-कहीं स्कूल 20 किलोमीटर से ज़्यादा दूर होते हैं।

और स्कूल छोड़ने की ये एक बड़ी वजह है क्योंकि बच्चों को घर के पास स्कूल नहीं मिलते. ये ड्रॉप-आउट रेट लगभग 40% का है जिनमें से ज़्यादातर लड़कियाँ होती हैं। अब अगर सरकार को इतनी बड़ी चुनौती को पूरा करना है तो सरकार को युद्ध स्तर पर काम करना होगा।

UDISE की रिपोर्ट के मुताबिक़ देश के सिर्फ़ 52% स्कूलों में एक साथ हाथ धोने, पीने का पानी और इस्तेमाल किये जाने लायक टॉयलेट की व्यवस्था है।

जहाँ तक आर्थिक निवेश की बात है तो कोठारी कमीशन ने 1966 में शिक्षा पर जीडीपी का छह फ़ीसद हिस्सा ख़र्च करने की बात कही थी। तब से आज की स्थितियों में भारी बदलाव हो चुका है। इन्फ़्लेशन काफ़ी बढ़ चुका है। ऐसे में छह फ़ीसदी बहुत काम है।

बीते दस सालों में शिक्षा के अधिकार क़ानून की वजह से लाखों बच्चियाँ स्कूल जाने में सक्षम हो सकी हैं क्योंकि इस क़ानून के तहत एक बच्चे को शिक्षा ना मिलना एक नीतिगत चूक नहीं, बल्कि उनके अधिकार का उल्लंघन है। और वे इस मामले में कोर्ट जा सकते हैं।


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