नई शिक्षा नीति से शिक्षा में बाजारीकरण को बढ़ावा मिलेगा, गरीब तबका शिक्षा से बाहर हो जयेगा – News

नई शिक्षा नीति से शिक्षा में बाजारीकरण को बढ़ावा मिलेगा, गरीब तबका शिक्षा से बाहर हो जयेगा

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नई शिक्षा नीति : स्कूली शिक्षा से लेकर उच्च शिक्षा तक कई बड़े बदलाव किये गए हैं। सरकार इसे भारतीय शिक्षा व्यवस्था में एक मील का पत्थर बता रही है। जबकि शिक्षा के क्षेत्र से जुड़े हितधारक चाहे वो छात्र ,शिक्षक या फिर शिक्षा से जुड़े शिक्षाविद सभी इसकी आलोचना कर रहे है।

वो इसे एक तरह से शिक्षा की गुणवत्ता में कमी और निजीकरण करने की साज़िश बता रहे है। उनका कहना है कि नई शिक्षा नीति देश में शिक्षा व्यवस्था को और कमजोर करेगी और गरीब जनता जिसका बड़ा तबका पहले से ही शिक्षा से बाहर है ,उसे शिक्षा में समाहित करने के बजाए ये उन्हें शिक्षा से और दूर करेगी।

भारत ज्ञान विज्ञान समिति के अध्यक्ष रामरतन अवध्या ने नई शिक्षा नीति की आलोचना करते हुए कहा है कि नई शिक्षा नीति से शिक्षा के बाजारीकरण को बढ़ावा मिलेगा। उन्होंने कहा है कि नई शिक्षा नीति का पैटर्न 5+3+3+4 होगा।

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शिक्षा नीति के विस्तृत अध्ययन से पता चलता है कि इससे शिक्षा में बाजारीकरण को बढ़ावा मिलेगा। इस शिक्षा नीति में वोकेशनल कोर्सज के नाम पर गरीब और निचले तबके के लोग मुख्यधारा से अलग हो जाएंगे।

नई शिक्षा नीति स्किल इंडिया के बहाने युवकों को कम मजदूरी की दुकानों पर कम मजदूरी के लिए धकेल दिया जाएगा। 2005 में भी शिक्षा नीति में बदलाव किए गए थे जो शिक्षा को बढ़ावा देने का ये सब महत्वपूर्ण कदम थे। लेकिन सरकार द्वारा लाई गई नई राष्ट्रीय शिक्षा 2020 नीति भारतीय शिक्षा को बर्बाद करने का एक प्रयास है।

सके अलावा उच्च शिक्षा में 2035 तक 50 फीसदी सकल नामांकन दर पहुंचने का लक्ष्य है। नई नीति में मल्टीपल एंट्री और एग्जिट (बहु स्तरीय प्रवेश एवं निकासी) व्यवस्था लागू किया गया है ।

नई शिक्षा नीति को “भारतीय शिक्षा को बर्बाद” करने का ‘‘एकतरफा अभियान’:सीपीआईएम

भारत की कम्युनिस्ट पार्टी-मार्क्सवादी (सीपीआईएम) सरकार द्वारा लाई गई नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति का विरोध किया और इसे “भारतीय शिक्षा को बर्बाद” करने का ‘‘एकतरफा अभियान’’ बताया। पार्टी ने आरोप लगाया कि इस नीति को तैयार करने के लिए संसद की पूरी तरह अवहेलना की गई है।

  • सीपीआईएम की ओर से जारी एक वक्तव्य में कहा गया, “माकपा पोलित ब्यूरो, नई शिक्षा नीति लागू करने के एकतरफा फैसले और मानव संसाधन विकास मंत्रालय का नाम बदलने के केंद्रीय मंत्रिमंडल के निर्णय की कड़े शब्दों में भर्त्सना करता है।”
  • बयान में कहा गया, “हमारे संविधान में शिक्षा समवर्ती सूची में है। केंद्र सरकार द्वारा, विभिन्न राज्य सरकारों के विरोध और आपत्तियों को दरकिनार कर एकतरफा तरीके से नई शिक्षा नीति लागू करना संविधान का पूरी तरह उल्लंघन है।”
  • पार्टी ने कहा, “यह एकतरफा फैसला भारतीय शिक्षा व्यवस्था को बर्बाद करने के लिए लिया गया है। इस नीति से भारतीय शिक्षा का केंद्रीकरण, सांप्रदायिकता और व्यवसायीकरण बढ़ेगा।”
  • सीपीआईएम ने कहा, “सीपीआईएम पोलित ब्यूरो भाजपा सरकार के इस निर्णय का कड़ा विरोध करता है। पोलित ब्यूरो की मांग है कि इसे लागू करने से पहले संसद में चर्चा की जाए।”

शिक्षा क्षेत्र से जुड़े लोगो इसका कर रहे है विरोध

देशभर में स्कूली शिक्षा के अधिकार के लिए संघर्ष करने वाले और आल इंडिया पेरेंट्स एसोसिएशन के अध्यक्ष वकील अशोक अग्रवाल ने भी इस नई शिक्षा नीति का विरोध किया। उन्होंने इसको एक भेदभाव बढ़ने वाला कहा।

जानी-मानी शिक्षाविद और दिल्ली यूनिवर्सिटी की फैकल्टी ऑफ एजुकेशन की पूर्व शिक्षिका अनीता रामपाल भी इसको लेकर अपना विरोध जाता चुकी है। उन्हें लगता है कि नए तंत्र के जरिए राज्यों के क्षेत्राधिकार पर अतिक्रमण किया जा रहा है।

छात्र संगठन एसएफआई के पूर्व राष्ट्रीय महासचिव विक्रम सिंह जोकि लगतार शिक्षा व्यवस्था पर लिखते है। उन्होंने इस नई शिक्षा निति को लकेर सरकार की मंशा पर सवाल उठाया और इसे मोदी मंत्रिमंडल का छात्रों के लिए फ़तवा क़रार दिया।

उन्होंने फेसबुक पर लिखा कि“… सवाल उठना लाजमी है कि इस समय जब पूरे देश का ध्यान कोरोना वायरस के संक्रमण को रोकने, बदहाल अर्थव्यवस्था को बचाने और बेरोजगारी की विकराल समस्या से पार पाने की आशा अपनी सरकार से कर रहा है, तब ऐसी क्या आफत आ गई कि इतने महत्वपूर्ण निर्णय के लिए सरकार संसद के सत्र की प्रतीक्षा तक नहीं कर पाई।”


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