मुश्किल नहीं है प्रवासी मजदूरों का आंकड़ा जुटाना, सराकरें ऐसा करके उन्हें घर भेज सकती है।

मुश्किल नहीं है प्रवासी मजदूरों का आंकड़ा जुटाना, सराकरें ऐसा करके उन्हें घर भेज सकती है।

Plz share with love

भारत में बीते 25 मार्च से ही देशव्यापी लॉकडाउन जारी है। इस दौरान देश के लगभग सभी वर्ग के लोग त्रस्त हैं, लेकिन लॉकडाउन से कामबंदी का सबसे अधिक असर श्रमिकों और खासकर प्रवासी श्रमिकों, कामगारों पर हुआ है।

दरअसल इनके सामने न केवल रहने-खाने की समस्या है, बल्कि मकान का किराया चुकाने की भी समस्या है। जीवनचर्या की राह मुश्किल होते देख बड़ी संख्या में इन प्रवासी मजदूरों ने अपने-अपने गांव जाने का फैसला लिया और आज व्यापक संख्या में ये श्रमिक, कामगार गांवों की ओर लौट रहे हैं। इनके गांव लौटने की व्यथा-कथा भी अंतहीन है।

देशव्यापी बंदी के कारण दिल्ली, मुंबई, अहमदाबाद, हैदराबाद, सूरत, पुणो एवं नासिक आदि शहरों में लाखों प्रवासी मजदूरों के सामने रोजी-रोटी का संकट उत्पन्न हो गया है।

काम-धंधा बंद होने से ये मजदूर निरंतर अपने घरों की ओर लौट रहे हैं। देश भर में श्रमिक पैदल, रिक्शा-ठेला, साइकिल, ट्रकों आदि में भरकर गांव की ओर जा रहे हैं।

सड़क हादसों में रोजाना बड़ी संख्या में मजदूर घायल हो रहे हैं और जान गंवा रहे हैं। इन घटनाओं को रोकने के लिए सरकारों को विचार करने की जरूरत है। आखिर आपदाओं के समय हमारा प्रशासनिक तंत्र इतना लाचार क्यों हो जाता है, यह एक बड़ा सवाल है।

एक अनुमान के मुताबिक देश में प्रवासी कामगारों की संख्या 45 करोड़ है। इनमें 33 फीसद श्रमिक, 30 फीसद अस्थायी श्रमिक एवं अन्य 30 फीसद असंगठित क्षेत्रों के कामगार हैं।

लॉकडाउन के बाद ज्यादातर श्रमिक अपने घर जाना चाहते हैं। संकट के समय किसी भी सरकार को अपनी कमियों और खूबियों को पहचानना चाहिए। स्वतंत्रता के बाद मजदूरों और किसानों की बेहतरी के लिए कई नीतियां बनीं, लेकिन इसका जितना फायदा मिलना चाहिए वह नहीं मिला।

दरअसल श्रमिकों और किसानों के हितों से जुड़ी योजनाओं का वास्तविक लाभ तभी मिलेगा, जब नीति निर्माताओं को उनके वास्तविक संख्याओं के विषय में ठोस जानकारी हो।

सरकारों के पास भी कोई सटीक आंकड़ा नहीं : भारत के कोने-कोने में करोड़ों प्रवासी मजदूर काम करते हैं। उनकी संख्या कितनी है और वे किन-किन प्रदेशों से ताल्लुक रखते हैं, इसका कोई ठोस अध्ययन नहीं है।

इन्हीं आधे-अधूरे और दुर्बल आंकड़ों के सहारे केंद्र एवं राज्य सरकारें बीते 73 वर्षो से मजदूरों की मुसीबतें कम करना चाहती हैं। आज विभिन्न राज्यों से प्रवासी मजदूरों का जत्था अपने-अपने प्रदेश लौट रहा है।

बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, बंगाल और ओडिशा आदि प्रांतों की कोई सरकार पक्के तौर यह नहीं बता पाएगी कि महाराष्ट्र, दिल्ली-एनसीआर, गुजरात, तेलंगाना, आंध्र-प्रदेश और तमिलनाडु समेत अन्य राज्यों में काम करने वाले श्रमिकों में उसके राज्य के लोगों की संख्या कितनी है?

उसी तरह जिन प्रदेशों के कल-कारखानों में प्रवासी मजदूर काम करते हैं और उनकी संख्या कितनी है, इस बारे में वहां की सरकारों के पास भी कोई सटीक आंकड़ा नहीं है।

धुनिक तकनीकी युग में यह काम काफी आसान हो गया है, लेकिन इसके लिए सभी राज्य सरकारों को अपनी प्रबल इच्छाशक्ति दिखानी होगी। बिहार से जुड़ा एक उदाहरण हमारे सामने है, लेकिन यह देश के सभी राज्यों से जुड़ी एक समस्या है।

आजादी से पहले भी बिहार से लोग कलकत्ता, ढाका, चटगांव, रंगून आदि जगहों पर काम करने जाते थे। पुराने लोग बताते हैं कि गांवों के दफेदार परदेस जाने वाले लोगों का पूरा हिसाब-किताब रखते थे, लेकिन आजादी के बाद जिम्मेदार लोगों की दैनंदिनी से यह परिपाटी समाप्त हो गई। यह निराश करने वाली बात जरूर है, लेकिन उम्मीदें खत्म नहीं हुई हैं।

अगर आज भी सभी राज्य सरकारें श्रम विभाग, ग्राम-पंचायतों और शहरी निकायों के जनप्रतिनिधियों को यह निर्देशित करें कि मजदूरी के लिए बाहर जा रहे लोगों का लेखा-जोखा नियमित रूप से दर्ज हो तो सरकारों के पास उनके राज्य से बाहर गए मजदूरों का एक विश्वसनीय आंकड़ा होगा।

राज्यों के यही आंकड़े केंद्र सरकार के अलावा श्रमिकों के कल्याण से जुड़े मंत्रलय के पास भी उपलब्ध होंगे। ग्राम-पंचायतों एवं शहरी निकायों द्वारा अगर इसे अमल में लाया जाता है तो इससे श्रमिक हित से जुड़ी नीतियां बनाने में भी मदद मिलेंगी।

भारत से प्रतिवर्ष लाखों लोग विदेश जाते हैं। उनके विषय में विदेश मंत्रलय के पास जब सटीक आंकड़ा हो सकता है तो फिर देश में प्रवासी मजदूरों के अद्यतन आंकड़े भी जुटाए जा सकते हैं।

गत दिनों पंचायती राज दिवस के मौके पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ग्रामीण विकास की गति बढ़ाने के लिए ई-ग्राम स्वराज पोर्टल का उद्घाटन किया था।

वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिये उन्होंने ग्राम-पंचायतों के प्रतिनिधियों से बातचीत की। ऐसे में यदि केंद्र एवं राज्य सरकारें ग्राम-पंचायतों को सशक्त तथा अधिकार संपन्न बनाना चाहती हैं तो इस मुहिम में ई-ग्राम स्वराज पोर्टल के जरिये अहम भागीदारी निभाई जा सकती है। अब यह समय की मांग है कि सभी प्रवासी श्रमिकों के पुख्ता आंकड़े जुटाए जाएं।


Plz share with love

Latest Post

Subscribe To Our Newsletter

[mc4wp_form id="319"]