शहरों में कम्पनियाँ न बंद हो जाए इस लिए मजदूरों को सड़को पर बेबस बदहाल छोड़ दिया गया ?

शहरों में कम्पनियाँ न बंद हो जाए इस लिए मजदूरों को सड़को पर बेबस बदहाल छोड़ दिया गया ?

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देशभर में तालाबंदी के बाद मजदूरों कि बेबसी सबके सामने है। तेलंगाना में वारंगल के सीमावर्ती इलाके में एक कुआं रहस्य का केंद्र बना हुआ है। किसी सस्पेंस थ्रिलर मूवी की तरह इस कुएं से लगातार शव निकल रहे हैं।

पुलिस को शुरुआती जांच में पता चला है कि इस कुएं से बरामद हुए 9 शवों में से 6 तो एक ही परिवार के सदस्यों के हैं। ये सभी पश्चिम बंगाल के प्रवासी मजदूर बताए जा रहे हैं। जो लॉक डाउन में आर्थिक तंगी जूझ रहे थे ?

शहरों में मजदूर फंसे हुए हैं उनकी दशा सबके सामने हैं और लगातार मीडिया में इसकी चर्चा भी हो रही है लेकिन सरकारें इन मजदूरों को उनके गांव या घर भेजने के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठा रही हैं। लॉक डाउन के शुरुआत में ही सरकारों को इस बात का अंदाजा था कि मजदूरों कि अगर मजदूर घर गए तो शहरो में फैक्टरियां बंद हो जाएँगी।

कई जानकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि एकाएक अचानक लॉकडाउन के बाद दिहाड़ी मजदूरों नौकरी खो चुके है इनके पास कुछ नहीं है। लॉक लम्बा चलने के बाद मजदूरों की स्थित और बिगड़ गई। मजदूरों के पास ना तो अब नौकरी बची है ना ही इन्हें अब वेतन दिया जा रहा है। सरकार मजदूरों को वेतन देने का जो वादा किया था वह भी वापस ले लिया है।

रोज़ औसतन चार मज़दूरों की मौत हो रही है।

गुजरात, अहमदाबाद, सुरत, महाराष्ट्र, दिल्ली, गाज़ियाबाद, नॉएडा में अभी भी फंसे मजदूर

देश में जब से लॉकडाउन शुरू हुआ है यानी 25 मार्च 2020 से लेकर अब तक रोज़ औसतन चार मज़दूरों की मौत हो रही है। कोरोना वायरस संक्रमण को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को देशव्यापी लॉकडाउन का ऐलान किए लगभग दो महीने हो चुके हैं। लॉकडाउन के अचानक हुए इस ऐलान के बाद देश में हज़ारों प्रवासी मज़दूरों को अपने घरों के लिए पैदल ही चलना पड़ा क्यों अंतरराज्यीय बस और रेल सेवाएं बंद की जा चुकी थीं।

बड़े-बड़े शहरों में फंसे प्रवासी मजदूर अभी भी गांव जाने की आशा में है। इन शहरों में फंसे मजदूरों का बकाया भी कई कंपनियां नहीं दे रही है। ऐसा में इनकी स्थिति और ख़राब है।

  • जाहिर है सरकार को उन मुद्दों को गंभीरता से लेना चाहिए और मजदूरों के दिलो में जो मौत का डर है उसे निकलना होगा।
  • अब समय ऐसी में बैठकर बड़े-बड़े भाषण का नहीं है जमीन पर जाकर कुछ काम करना होगा।
  • उद्योग धंधे बंद होने का डर है लेकिन भविष्य में इन फैक्टरियों को ग्रामीण क्षेत्र में लगाना होगा।


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