एक रिटायर्ड पुलिस महानिरीक्षक की गिरफ्तारी और संविधान को रौंदती सरकार – News

एक रिटायर्ड पुलिस महानिरीक्षक की गिरफ्तारी और संविधान को रौंदती सरकार

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एक I.G. की आपबीती, By: S.R Darapuri

मैं उत्तर प्रदेश कैडर का 1972 बैच का 76 वर्षीय आईपीएस अधिकारी हूं। मैं वर्ष 2003 में पुलिस महानिरीक्षक के रूप में रिटार्यड हुआ और तब से मैं गरीब, मजदूर और शोषित दलितों के लिए सामाजिक अन्याय के खिलाफ इन निरीह मजलूमों की आवाज उठाता रहा हूं।

मैं उत्तर प्रदेश, राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग का सलाहकार रहा और मैंने 2014 और 2019 में रॉबर्ट्सगंज से लोकसभा चुनाव लड़ा। मैं फिलहाल पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज का प्रदेश उपाध्यक्ष हूं।

इसके साथ ही मैं अखिल भारतीय पीपुल्स फ्रंट का राष्ट्रीय प्रवक्ता भी हूं। फिलवक्त मैं उत्तर प्रदेश के सोनभद्र, मिर्जापुर और चंदौली जिलों में दलितों, आदिवासियों, किसानों और मजदूरों के समाजिक अधिकारों और उनके न्याय के लिए लड़ रहा हूं।

जो मैं आपको बताने जा रहा हूं वह एक ऐसे दलित की वेदना है जो पढ़-लिख कर IPS बना और पुलिस के सबसे काबिल ऑफिसर के तौर पर देश की सेवा की। लेकिन मुझे नहीं मालूम था कि इतने ऊंचे ओहदे पर पहुंचने के बाद भी जातियता का विष हर वक्त मुझ पर उड़ेला जाएगा और मेरे घरवालों को हर-पल प्रताड़ित किया जाएगा।

ये घटना उन दिनों की है जब 2019 के दिसंबर माह में CAA (नागरिकता संशोधन अधिनियम) के विरुद्ध देश भर में आपातकाल जैसी स्थिति थी। जगह-जगह धरना-प्रदर्शन हो रहे थे और सरकार इन धरना-प्रदर्शनों को दबाने के लिए गोली-बंदूक से लेकर सत्ता की ताकत का खुलेआम दुरुपयोग कर रही थी।

मैंने भी सरकार द्वारा पारित (CAA) का विरोध किया क्योंकि मुझे लगा कि ये नया कानून, संविधान प्रदत्त मौलिक धारणाओं के विरूद्ध है। इस काले कानून के विरुद्ध मैंने 19 दिसंबर को शांतिपूर्ण तरीके से विरोध का फैसला किया।

लोकतांत्रिक मूल्यों को बचाने के लिए, लिए गए इस फैसले ने मुझे उन दिनों की याद दिला दी जब आजादी से पहले अंग्रेजों की सरकार ऐसे फैसलों के खिलाफ नागरिकों को प्रताड़ित करके उन्हें जेलों में ठूंस देती थी।

जुर्म और अन्याय के खिलाफ बोले गए प्रत्येक शब्द को गला रूंध कर बोलने से पहले ही सीने में हमेशा के लिए दफन कर देती थी। मुझे नहीं मालुम था कि आजाद हो चुके भारत में भी एक आई.पी.एस. अधिकारी की आवाज को ठीक उसी तरह से सीने में रूंधा जाएगा जैसे अंग्रेजों की सरकारें, सरकार के खिलाफ बोले गए शब्दों के बाद ऐसा कुकृत्य हिन्दुस्तानियों के साथ अक्सर करती थीं।

19 दिसंबर की सुबह जब मैं अपने घर से मॉनिंग वॉक के लिए बाहर निकला तो मैंने देखा कि मेरे घर के बाहर एक पुलिस वाला खड़ा है। मैंने उससे घर के बाहर खड़े होने का कारण पूछा तो उसने जवाब दिया कि आप के घर के बाहर आप की निगरानी के लिए मेरी ड्यूटी लगी है।

ये सब चल ही रहा था कि तभी पुलिस की एक और गाड़ी मेरे घर पहुंची जो कई अन्य पुलिस कर्मियों को मेरे घर, मेरी निगरानी के लिए छोड़ गई।

ये सभी पुलिसकर्मी शाम पांच बजे तक मेरे घर पर रहे। मैंने खुद की नजरबंदी के खिलाफ फेसबुक पर एक पोस्ट लिखी और बाद में लखनऊ में हिंसा की खबर मिलने के बाद अपडेट करते हुए हिंसा की निंदा की।

इस घटना के दूसरे दिन दोपहर से कुछ देर पहले गाजीपुर के CEO दीपक कुमार और एक इंस्पेक्टर विजय सिंह पुलिस बल के साथ मेरे घर पहुंचे और मुझे थाने चलने के लिए कहा।

मैंने अधिकारियों से सवाल किया कि क्या ये मेरी गिरफ्तारी है तो पुलिस की ओर से बस इतना जवाब मिला कि मुझे थाने चलना है। मुझे लगा कि धारा 151 के तहत कोई कार्रवाही होगी और शाम को ये लोग मुझे घर पर छोड़ देंगे।

लेकिन थाने पहुंचने पर देखा, पुलिस के तेवर बिल्कुल बदले हुए थे और आप को जानकर हैरानी होगी कि वे एक पुलिस के रिटायर्ड “इंसपेक्टर जेनरल” से किसी सड़क छाप अपराधी की तरह बात कर रहे थे।

मुझे घर के किसी सदस्य से मिलने या बात करने की अनुमति नहीं थी। जब मेरी पत्नी ने थाने में यह जानने के लिए फोन किया कि मैं कहां हूं तो थाने से जवाब में कहा गया कि इसकी जानकारी थाने को नहीं है।

थाने से मिले इस जवाब के बाद मेरी पत्नी बुरी तरह घबराकर गई और उसने लखनऊ के पुलिस कप्तान को व्हाट्सएप मैसेज भेज कर घटना की जानकारी दी लेकिन वहां से भी उन्हें कोई माकूल जवाब नहीं मिला, जिसके बाद मेरी पत्नी ने एक फेसबुक पोस्ट लिखी और इस पोस्ट में बताया कि पुलिस के कुछ लोग मेरे पति को घर से उठा ले गए हैं और इस वक्त वे कहां हैं लखनऊ की पुलिस बता नहीं रही है।

शाम करीब 5:30 बजे मुझे पुलिस की गाड़ी से हजरतगंज पुलिस स्टेशन ले जाया गया। थाने में मैंने इंस्पेक्टर धीरेंद्र प्रताप से पूछा कि क्या मेरी गिरफ्तारी हुई है तो धीरेन्द्र ने झल्लाकर कहा कि “हाँ, अब तक 39 को गिरफ्तार कर चुका हूं और आपका चालीसवां नंबर है।

लगभग 8 बजे एक सब-इंस्पेक्टर ने मुझे बताया कि मुझे रिमांड मजिस्ट्रेट के सामने पेश होना है। इस जानकारी के बाद मैंने पुलिस से अपने वकील को बुलाने के लिए कहा। लेकिन पुलिस ने मुझे वकील बुलाने की अनुमति नहीं दी। इसके बाद मुझे रिमांड मजिस्ट्रेट के सामने रीवर बैंक कॉलोनी में पेश किया गया।

मैंने रिमांड मजिस्ट्रेट को बताया कि 19 दिंसबर को यानी जिस दिन लखनऊ में हिंसा हुई थी, उस दिन मुझे पुलिस ने सुबह 7 बजे से शाम 5 बजे तक अवैध तरीके से घर में नजरबंद कर ऱखा था। मुझे दूसरे दिन सुबह 11:45 बजे घर से उठाया गया था और अब रात 8 बजे आपके सामने पेश किया जा रहा है।

जब रिमांड मजिस्ट्रेट ने पुलिस से पूछा कि इनके खिलाफ क्या आरोप है तो पुलिस के एस.आई. ने जवाब दिया कि मुझ पर आपराधिक साजिश के लिए आईपीसी की धारा 120बी के तहत गिरफ्तार किया गया है।

हम दोनों को सुनने के बाद, मजिस्ट्रेट ने पुलिस को फटकार लगाते कहा कि किस तरह से निर्दोष लोगों के खिलाफ झूठे मुकदमों में फंसा रही है, वे पुलिस के खिलाफ कड़ी कारर्वाई करेंगे।

मजिस्ट्रेट ने यह कहते हुए पुलिस को जेल रिमांड देने से इनकार कर दिया। मजिस्ट्रट ने इस बातचीत के बाद कागज पर कुछ लिखना शुरू किया और मुझे बाहर इंतजार करने के लिए कहा गया।

इसके तुरंत बाद इंस्पेक्टर हजरतगंज, धीरेन्द्र प्रताप कुशवाहा मजिस्ट्रेट के आवास पर पहुंचे और मजिस्ट्रेट से बात करने अंदर चले गए। इंस्पेक्टर और मजिस्ट्रेट के बीच काफी लंबी बातचीत हुई लेकिन रिमांड मजिस्ट्रेट ने इंस्पेक्टर की कोई बात नहीं सुनी और इस तरह मुझे उस वक़्त जेल रिमांड पर नहीं भेजा गया।

इस तरह काफी समय बीत गया! करीब आधी रात को पुलिस मुझे हजरतगंज थाने वापस लेकर फिर से पहुंची।

इसके बाद पुलिस ने एक और झूठी कहानी गढ़ी पुलिस ने केस डायरी में लिखा कि रिमांड मजिस्ट्रेस स्वास्थ्य कारणों से घर पर मौजूद नहीं थे इस लिए पुलिस मुझे जेल रिमांड पर नहीं ले सकी।

केस डायरी में यह भी कहा गया है कि मुझे शाम 5:40 बजे महानगर के एक पार्क से गिरफ्तार किया गया था, जबकि मुझे सुबह 11:45 बजे मेरे घर से ले जाया गया था।

आप को पता होगा दिसंबर में कितनी सर्दी होती है? मैं फार्मल ड्रेस में था इसलिए मुझे सर्दी लग रही थी।इसलिए मैंने पुलिस से एक कंबल मांगा, तो पुलिसकर्मियों ने मुझे बताया कि लखनऊ एसएसपी कलानिधि नैथानी और इंस्पेक्टर हजरतगंज ने मुझे कोई भी सामग्री नहीं देने के निर्देश दिए हैं।

जैसे ही थाने से मुंशी बाहर गया तो मैंने मौका देखकर उसके मोबाइल से अपने घर पर अपने बेटे को फोन किया। मैंने बेटे को बताया कि मैं थाना हजरतगंज में हूं, यहां पर सर्दी बहुत है, इसलिए मुझे जैकेट, कंबल और मेरी टोपी की जरूरत है।

करीब 2 बजे मेरा बेटा आया और उसने मुझे बताया कि जब वह दिन में पुलिस स्टेशन आया था तो पुलिस ने उसे भी गिरफ्तार करने की धमकी दी थी।

इस तरह मुझे 21 दिसंबर तक यानी दो दिनों तक मुझे पुलिस हिरासत में रखा गया और बाद में मुझे करीब शाम 7 बजे के आसपास एक दूसरे रिमांड मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया गया। मैंने पिछले मजिस्ट्रेट को जो बताया था उसे फिर से एक बार दुहरा दिया।

लेकिन इस मजिस्ट्रेट ने मेरी बात पर कोई ध्यान नहीं दिया और उसने 14 दिनों के जेल रिमांड पर हस्ताक्षर कर दिए। मैंने रिमांड मजिस्ट्रेट को बताया कि मैंने खुद पुलिस विभाग में 33 वर्ष तक अपनी सेवाएं दी हैं, लेकिन किसी ने कुछ नहीं सुना।

निश्चित रूप से आप जानते होंगे कि यह प्रणाली कैसे काम करती है? इस तरह मैं रात करीब साढ़े नौ बजे जेल की बैरक में पहुंचा। जब पुलिस ने पिछले सुबह को मुझे उठाया था तब मैंने अपना नाश्ता भी नहीं किया था और जेल पहुंचने तक पुलिस ने मुझे कोई खाना-पानी नहीं दिया।

जेल में भी मुझे खाना नहीं मिला क्यों कि तब काफी रात हो चुकी थी। ये तो मेरे और मेरे परिवार के उत्पीड़न की एक बानगी थी, लेकिन इसके बाद जो हुआ वह और भी डरावना और कष्टदायक था।

इसके बाद पुलिस ने कानून को ताक पर रख कर किस तरह मजाक बनाया, अब उसे सुनिए। मेरा नाम एफआईआर में नहीं था, लेकिन फिर भी मुझे झूठा फंसाया गया, गिरफ्तार किया गया और 3 सप्ताह के लिए जेल भेज दिया गया।

यहां तक कि कानूनी प्रोटोकॉल के तहत हजरतगंज थाने में सीआरपीसी की धारा 161 के तहत मेरे बयान दर्ज किए जाने थे, लेकिन वो भी नहीं किए गए।

चूंकि मैं पूरी तरह से निर्दोष था और पुलिस, अदालत में मेरे खिलाफ कोई सबूत पेश नहीं कर पाई, इसलिए मुझे 7 जनवरी को जमानत पर रिहा कर दिया गया।

अब अदालत में एक आरोप-पत्र (चार्ज शीट) दायर किया गया है, जिसमें मुझे दंगे भड़काने का मास्टर माइंड के रूप आरोपी बनाया गया है।

प्रताड़ना का ये दौर आज भी ब-दस्तूर जारी है, मैं आपको बता चुका हूं कि 19 दिसंबर को लखनऊ में सीएए के विरोध प्रदर्शन के दौरान हुई हिंसा से मेरा कोई लेना-देना नहीं था, लेकिन फिर भी मुझे मेरे खिलाफ राजनीतिक प्रतिशोध के तहत गलत आरोप में फंसाया गया है।

आपने टीवी-मीडिया में देखा होगा कि कैसे योगी सरकार ने लखनऊ में पोस्टर और होर्डिंग्स लगाकर पब्लिक प्रापर्टी को नुकसान पहुंचाने का नोटिस चस्पा करके हमारे नाम और पते को सार्वजनिक किया था।

इस घटना की देश भर में निंदा हुई और बाद में इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने योगी सरकार को इन अवैध होर्डिंग्स को हटाने का निर्देश दिया। लेकिन राज्य सरकार ने इन आदेशों को मानने से इंकार कर दिया। इसके बाद मार्च 2020 में मुझे ₹64,00,000/- (चौंसठ लाख रुपए) का रिकवरी नोटिस दिया गया।

जिस अपराध को मैंने कभी किया ही नहीं, उस झूठे मुकदमें को अदालत में चलाया जा रहा है। मैंने इलाहाबाद हाईकोर्ट में एक रिट याचिका दायर की जिसमें मैंने कोर्ट को बताया कि लखनऊ के तहसीलदार के द्वारा जारी किया गया नोटिस 143(3) के तहत अवैध है।

लेकिन मेरी इस याचिका पर अभी तक कोई आदेश पारित नहीं किया गया है। इतना ही नहीं इस बीच, राजस्व अधिकारी मेरे घर पर लगातार छापा मार रहे हैं और मुझे गिरफ्तार करके मेरी घर की संपत्ति को जब्त करने की धमकी दे रहे हैं।

उ.प्र. की इस सरकार ने मुझे और मेरे परिवार को मेरी 33 वर्ष की सेवा का ये इनाम दिया है। मुझे और मेरे परिवार को किस तरह प्रताड़ित करके मानसिक और शारीरिक प्रताड़ना दी है, आप देख सकते हैं।

इस समय मेरी 74 साल की पत्नी कोमोरोबिटी (लिवर सिरोसिस, हार्ट प्रॉब्लम, अस्थमा और डायबिटीज) से पीड़ित है और बिस्तर पर पड़ी है। मेरा पोता और पोती जो सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी कर रहे हैं, उनकी पढ़ाई पूरी तरह बाधित हो चुकी है और इस समय वे बहुत परेशान हैं। लेकिन मुझे खुशी है कि मेरा पूरा परिवार चट्टान की तरह मेरे पीछे खड़ा है।

जब मैं जेल में था तब प्रियंका गांधी मेरे घर आई थी और मेरे स्वास्थ्य के बारे में पूछी थी, मैं उनकी इस नेक-नियत का ह्दय से आभारी हूं। इतना प्रताड़ित होने के वाबजूद मैंने अपने जज्बातों को आज तक संयम में रखा है। लेकिन मेरी यह लड़ाई मेरी आखरी श्वांस तक जारी रहेगी।

आप देख सकते हैं कि अपने जीवन के 33 साल भारतीय पुलिस सेवा को देने के बाद भी किस तरह से एक पूर्व आई.जी. न्याय के लिए दर-दर भटक रहा है।

ऐसे में आप अंदाजा लगा सकते हैं कि एक सामान्य व्यक्ति किस तरह से इस सिस्टम को झेलता होगा। इन अनुभवों के आधार पर मैं कह सकता हूं कि राज्य सरकार जब तानाशाह हो जाए तो शोषण और दमन का दौर सत्ता-परिवर्तन तक ऐसे ही चलता रहता है।


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