भीमा कोरेगांव 3 साल बाद भी पुलिस कुछ साबित नहीं कर पाई, 16 सामाजिक कार्यकर्ताओं, कवियों और वकीलों को गिरफ़्तार कर रखा। – महाराष्ट्र

भीमा कोरेगांव 3 साल बाद भी पुलिस कुछ साबित नहीं कर पाई, 16 सामाजिक कार्यकर्ताओं, कवियों और वकीलों को गिरफ़्तार कर रखा।

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एक जनवरी 2018 को ईस्ट इंडिया कंपनी और मराठों के बीच हुए युद्ध की 200वीं वर्षगांठ के जश्न के दौरान भीमा-कोरेगाँव में हिंसा भड़क उठी थी। वहां आगज़नी और पथराव हुआ था जिसमे कई गाड़ियों को नुक़सान पहुँचा और एक शख़्स की जान चली गई थी।

इस घटना से एक दिन पहले 31 दिसंबर 2017 को ऐतिहासिक शनिवार वाड़ा पर एल्गार परिषद का आयोजन किया गया था। प्रकाश आंबेडकर, जिग्नेश मेवाणी, उमर खालिद, सोनी सोरी और बी.जी. कोलसे पाटिल जैसी हस्तियों ने सम्मेलन में हिस्सा लिया था।

आठ जनवरी 2018 को तुषार दामगुडे नाम के शख़्स ने एल्गार परिषद में हिस्सा लेने वाले लोगों के ख़िलाफ़ शिकायत दर्ज करवाई थी। एफ़आईआर में दावा किया गया कि एल्गार परिषण में भड़काऊ भाषण दिए गए, जिसकी वजह से अगले दिन हिंसा हुई. इस एफ़आईआर के आधार पर पुलिस ने कई सामाजिक कार्यकर्ताओं, वकीलों और कवियों को गिरफ़्तार किया।

17 मई 2018 को पुणे पुलिस ने यूएपीए की धाराओं 13, 16, 18, 18B, 20, 39, और 40 के तहत मामला दर्ज किया। एएनआई ने भी मामले के संबंध में 24 जनवरी 2020 को भारतीय दंड संहिता की धारा 153A, 505(1)(B), 117 और 34 के अलावा यूएपीए की धारा 13, 16, 18, 18B, 20 और 39 के तहत एफ़आईआर दर्ज की।

इस घटना और कई गिरफ़्तारियों के बाद अब तक भीमा-कोरेगाँव मामले में क्या मोड़ आए हैं? आज तक सवालों के जवाब नहीं मिल रहे है।

  • एएनआई अपनी जाँच में कहां तक पहुंची है?
  • क्या सभी चार्जशीट दायर हो चुकी हैं और न्यायिक प्रक्रिया पूरी हो चुकी है?
  • भीमा कोरेगाँव में हुई हिंसा के लिए कौन ज़िम्मेदार है?
  • क्या जांच एजेंसियां दोषियों को ढूंढने में सफल रही हैं?

देवेंद्र फडणवीस के नेतृत्व वाली तब की महाराष्ट्र सरकार ने भीमा कोरेगांव हिंसा की जांच के लिए 9 फ़रवरी 2018 को एक दो सदस्यीय न्यायिक आयोग गठित किया था। कोलकाता उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त मुख्य न्यायाधीश जे.एन. पटेल ने इस आयोग की अध्यक्षता की।

इस आयोग को चार महीने के अंदर अपनी रिपोर्ट पेश करनी थी, लेकिन अब तक कई बार और समय दिए जाने के बावजूद आयोग ने अपनी अंतिम रिपोर्ट पेश नहीं की है।


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