भीमा कोरेगाँव हिंसा : 3 साल बाद संभाजी भिड़े के खिलाफ चार्जशीट दाखिल करने की मंजूरी, सरकार का ये कैसा दोमुहा चरित्र है ? – News

भीमा कोरेगाँव हिंसा : 3 साल बाद संभाजी भिड़े के खिलाफ चार्जशीट दाखिल करने की मंजूरी, सरकार का ये कैसा दोमुहा चरित्र है ?

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संभाजी भिड़े का नाम नेशनल मीडिया की सुर्खियों में तब आया था, जब 1 जनवरी, 2018 को पुणे के पास पड़ने वाले भीमा कोरेगांव में हिंसा हो गई थी। पुणे और मुंबई में कई जगहों पर दंगे जैसे हालात हो गए और इसमें एक आदमी की मौत हो गई।

बहुजन रिपब्लिकन पार्टी की अनिता रविंद्र साल्वे ने संभाजी भिड़े के खिलाफ केस दर्ज करवाया और आरोप लगाया कि भिड़े और मिलिंद एकबोटे ने मिलकर प्रदर्शनकारियों के झंडे फाड़े और पत्थरबाज़ी की, जिसके बाद हिंसा भड़की।

पक्ष-पाती कार्यवाही के लगते रहे आरोप

भीमा कोरे गाँव हिंसा में आठ जनवरी 2018 को तुषार दामगुडे नाम के शख़्स ने एल्गार परिषद में हिस्सा लेने वाले लोगों के ख़िलाफ़ शिकायत दर्ज करवाई थी। एफ़आईआर में दावा किया गया कि एल्गार परिषण में भड़काऊ भाषण दिए गए, जिसकी वजह से अगले दिन हिंसा हु।

लेकिन स्थानीय लोगो कर मीडिया की कई ख़बरों के अनुसार हिंसा भड़काने में संभाजी भिड़े का नाम सामने आया था। लेकिन पुलिस ने कार्यवाही करते हुए
एफ़आईआर के आधार पर पुलिस ने कई सामाजिक कार्यकर्ताओं, वकीलों और कवियों को गिरफ़्तार किया जो दलित और बहुजन समज से थे लेकिन संभाजी भिड़े “गुरु जी” के खिलाफ कार्यवाही तक नहीं हुयी।

17 मई 2018 को पुणे पुलिस ने यूएपीए की धाराओं 13, 16, 18, 18B, 20, 39, और 40 के तहत मामला दर्ज किया। एएनआई ने भी मामले के संबंध में 24 जनवरी 2020 को भारतीय दंड संहिता की धारा 153A, 505(1)(B), 117 और 34 के अलावा यूएपीए की धारा 13, 16, 18, 18B, 20 और 39 के तहत एफ़आईआर दर्ज की।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक और मोदी के गुरु कहे जाने वाले भिड़े पर कार्यवाही में 3 साल का समय क्यों लगा ?

भिड़े एक वक्त राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक होते थे। फिर 1980 के दशक में उन्होंने संघ छोड़कर शिव प्रतिष्ठान हिंदुस्तान नाम का एक संगठन बनाया। संगठन नया था, लेकिन भिड़े की विचारधारा में कोई फर्क नहीं था।

इसका ज़िक्र राष्ट्रीय मीडिया में तब होने लगा जब उसने 2008 में आई फिल्म ‘जोधा अकबर’ का विरोध किया।तब संगठन के लोगों ने फिल्म की स्क्रीनिंग रोकने के लिए थिएटर्स में तोड़फोड़ की। 2014 के आम चुनावों से पहले जब शिव प्रतिष्ठान के एक कार्यक्रम में नरेंद्र मोदी का आना हुआ, तो उन्होंने कहा,

मैं भिड़े गुरुजी का बहुत आभारी हूं क्योंकि उन्होंने मुझे निमंत्रण नहीं दिया था। उन्होंने मुझे हुकम किया था. मैं भिड़े गुरुजी को बहुत सालों से जानता हूं। हम जब समाज जीवन के लिए कार्य करने के संस्कार प्राप्त करते थे, हमारे सामने भिड़े गुरुजी का उदाहरण पेश किया जाता था। उनकी सादगी, उनका कठोर परिश्रम, ध्येय के प्रति समर्पण और अनुशासन।

खुद भिड़े भी गाहे बगाहे प्रधानमंत्री से अपनी नज़दीकी के किस्से कहते रहते हैं। यूट्यूब पर ऐसे ही एक वीडियो में उन्हें कहते हुए सुना जा सकता है –

प्रधानमंत्री मोदी के साथ संभाजी भिड़े.

“मोदी मेरे पास आशीर्वाद लेने आए थे। वो प्रधानमंत्री बने। पहली ही बार में लाल किले से बिना कांच के सुरक्षा कवच भाषण दिया, भगवा फेटा (पगड़ी) बांध कर। जब चंद्रकांत दादा पाटील ने प्रधानमंत्री से पूछा कि आपने भगवा फेटा कैसे बांध लिया। तब मोदी ने जवाब में कहा कि जब मैं रायगढ़ गया था, तब गुरुजी ने कहा था कि भगवा फेटे में ही भाषण होना चाहिए। तो भगवा फेटे के मर्म को समझो। इस देश को भगवा फेटा बांधना है हमें।”

2018 में महारष्ट्र में भाजपा की सरकार थी

हिंसा के एक दिन बाद, 2 जनवरी, 2018 को, दलित राजनीतिक कार्यकर्ता अनीता सावले ने भीमा कोरेगांव में हिंसा के लिए उकसाने का आरोप लगाते हुए श्री शिवप्रतिष्ठान हिंदुस्तान के संभाजी भिड़े और समस्ती हिंदू अगाड़ी मिलिंद एकबोटे के खिलाफ पिंपरी पुलिस स्टेशन (तब पुणे शहर पुलिस क्षेत्राधिकार के तहत) पहली सूचना रिपोर्ट दर्ज की थी।


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दोनों पर आईपीसी और एससी और एसटी अत्याचार निवारण अधिनियम की धाराओं के तहत मामला दर्ज करवाया गया था। इस मामले को बाद में पुणे ग्रामीण पुलिस के शिकारपुर थाने में स्थानांतरित कर दिया गया, जिसके अधिकार क्षेत्र में कोरेगांव भीमा हिंसा हुई थी। तब से पुलिस ने कभी भी सबूतों के अभाव का हवाला देते हुए भिडे को गिरफ्तार नहीं किया।

एकबोटे को इस मामले में 14 मार्च, 2018 को सुप्रीम कोर्ट द्वारा उनकी अग्रिम जमानत खारिज होने के बाद गिरफ्तार किया गया था। एकबोट ने 30 दिसंबर, 2017 को पुणे शहर में और उसके बाद कोरेगाँव भीमा इलाके में होटल सोनाई में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस आयोजित की थी।

यह आरोप लगाया गया था कि होटल की बैठक में एकबोटे द्वारा दिया गया “पैम्फलेट” 1 जनवरी को हिंसा का कारण बनने की साजिश का हिस्सा था। ।

अब सवाल उठता है कि भारत में एक विधायक के लगुवा -भगवा को पुलिस की हिम्मत नहीं होती की गिरिफ्तार करे तो जिस व्यक्ति का कथित आशीर्वाद खुद देश का प्रधान मंत्री लेता हो उसे कैसे पुलिस गिरफतार कर सकती है जबकि राज्य की सरकार भी उसी पार्टी कि चल रही हो.


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