20 आईआईएम ने सरकार को लिखी चिठ्ठी, IIM संस्थानों में शिक्षकों की नियुक्ति आरक्षण करे खत्म

20 आईआईएम ने सरकार को लिखी चिठ्ठी, IIM संस्थानों में शिक्षकों की नियुक्ति आरक्षण करे खत्म

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नयी दिल्ली, एक जनवरी सभी 20 भारतीय प्रबंध संस्थानों (आईआईएम) ने मानव संसाधन विकास मंत्रालय से अनुरोध किया है कि उन्हें शिक्षण कर्मचारियों में अनुसूचित जाति (एससी), अनुसूचित जनजाति (एसटी) तथा अन्य पिछड़ा वर्गों (ओबीसी) और आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों (ईडब्ल्यूएस) पद के लिए आरक्षण खत्म कर दिया जाये।

हमारे संविधान में जब अनुसूचित जाति एवम अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षण की ब्यवस्था लागू की गयी थी तो उसके पीछे तर्क था की समाज का जो तबका सदियो से ऊँची जाति के उत्पीडन एवं दमन का शिकार रहा है जिसके पास अपनी जमीन नहीं है जिसे पढ़ने –लिखने यानी ज्ञान अर्जित करने से रोका गया यंहा तक की उनको मन्दिरों में पूजा करने से रोका जाता था, कुंए से पानी भरने की अनुमति नही थी उसे समाज की मुख्य धारा में लाने के लिए आरक्षण का लाभ दिया गया।

लेकिन आजादी के 70 दसक बाद आज भी वो सामाजिक बुराईयां विद्यमान है। जहाँ तक आरक्षण की बात है वह केवल भारत में ही नही है बल्कि यह पूरी दुनियां में है। आज देश में दलित और आदिवासियों की संख्या लगभग 26 करोड़ है और भारत में कुल नौकरियों की संख्या 2 करोड़ है।

दलित और आदिवासियों का आरक्षण कुल मिलाकर देखा जाए तो 22.5 फीसदी है जहाँ 22 .5 आरक्षण को अगर 100 फीसदी लागू कर दिया जाय तो 45 लाख दलित और आदिवासी लोगो को सरकारी नौकरियों में होना चाहिए लेकिन यह दुर्भागय रहा है की ऐसा नहीं हुआ।

आजादी के 70 साल बाद भी दलित और आदिवासी समुदाय को मात्र 2% का ही आरक्षण मिल पाया है । लेकिन इस देश में प्रोपेगेंडा इस कदर किया जा रहा है की मात्र दो फीसदी दलितों नें पूरे देश की नौकरियों पर कब्ज़ा कर लिया हो।

आरक्षित पदों अभ्यार्थियों को अयोग्य ठहरना उनके हक़ पर ठाका डालने की शाजिस ताकि वे बराबरी पर न आ सके

आरक्षण को समाप्त करने लिए जोर-जोर ढोल पीटा जा रहा है । इतना ही नहीं देश में दलित आदिवासियों को आगे बढ़ने से रोकने के लिए अनेक हथकंडे आपनाये जा रहे है।

अधिकतर आरक्षित सीटों पर आने वाले उम्मीदवारों को आयोग्य घोषित कर दिया जाता है। भारत के कुछ बुद्धजीवी या नेता कहते है की दलित और आदिवासी आरक्षण केवल 10 साल के लिए था लेकिन वह केवल राजनीति में था न की शिक्षा और नौकरियों में। एक तरफ हमारी सरकारें अमेरिका जैसे विकसित देशो का डेवलपमेंट एजेंडा अपनाते है तो दूसरी तरफ कारपोरेट सेक्टर में आरक्षित लोगो को आगे लाने पर इनाम दिया जाता है।

भारत का कारपोरेट सेक्टर एंटी रिजर्वेसन एजेंडा अपनाता है |

7 दशक पहले जिस आरक्षण की व्यवस्था समता मूलक समाज की स्थापना के लिए किया गया था क्या पूरा हो पाया है? इस पर किसी ने विचार करने का प्रयास नहीं किया। 2001 के आंकडे देखे तो दिल्ली विवि. में 6500 शिक्षक थे जिनमे से SC /ST के 1500 शिक्षक होने चाहिए थे लेकिन वहां पर महज 100 ही थे।

जहाँ एक तरफ दलितों को फोर्थ क्लास की सर्विस में आरक्षण मुश्किल से मिलता है तो वंही A- ग्रेड नौकरियों में आरक्षण नगण का दिया गया है।

ऐसा तो नहीं है कि 70 साल बाद दलितों में योग्यता की कमी आ गई है। जिसका उदाहरण आईएएस या आईपीएस जैसी प्रशासनिक पदों पर गिने चुने ही दलित लोग है। केन्द्रीय सचिव के पद पर एससी कोटे का प्रतिनिधित्व नहीं है और वही एससी कोटे से महज 4 केन्द्रीय सचिव है जबकि 2011 के मुताबिक देश में 149 केंद्रीय सचिव के पद थे।

निजीकरण से होगा सामाजिक धुर्वीकरण, वर्ग या जाति विशेष को लाभ पहुंचाने की चाल

ग्रुप A नौकरियों में 11.1 फीसदी एससी तथा 4.6 फीसदी एसटी है। जहाँ देश में कार्पोरेट सेक्टर में 93 % बोर्ड मेम्बर्स सवर्ण थे वही जिनमे 46 वैश्य, 44 % ब्राह्मण है वही एससी –एसटी महज 3 .5 % है।

सरकारी नौकरियों में आज भी हजारो आरक्षित पद खाली है आखिर ये सीटे क्यों नहीं भरी जाती है। देश के उच्च शिक्षण संस्थानों जैसे आई आई टी, आई आई एम, मेडिकल कालेजो , केंद्रीय विवि. में इनकी उपस्थिति न के बराबर होती है।

अभी हाल ही में मद्रास आई आई टी का पेरियार स्टडी सर्किल का मामला हो या आईआईटी रूडकी में दलित छात्रो को कालेज से निकालना हो या फिर देश की दलित आरक्षित अम्बेडकर केंद्रीय विवि. लखनऊ में छात्रो के भेदभाव का मामला सहित देश के कोने-कोने से दलित विरोधी गतिविधियाँ सामने आती है।

बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में फिरोज खान का मामला अभी ताजा है जिन्हे संस्कृत विभाग में इस लिए नहीं पढ़ाने दिया गया क्योंकि मुस्लिम थे आखिर में इस्तीफ़ा देना ही पड़ा। जबकि बनरस में आरक्षित पदों पर होने वाली भर्ती को NFS कर दिया गया। ऐसा तो नहीं था की आरक्षित सीटों के उम्मीदवारों में कोई काबिल नहीं था।

आरक्षण होने पर भी जब नहीं मिला लाभ, तो बिन आरक्षण कैसे।

ओबीसी ओर अल्पसंख्यक संगठनों सहित अखिल भारतीय प्रजापति कुम्भकार महासंघ यूपी द्वारा समर्थन के क्रम में प्रदेश अध्यक्ष रामपाल प्रजापति ने कहा कि आज पूरे देश मे 85 प्रतिशत लोगो के हक अधिकारों के खिलाफ संबिधान को खत्म करने की साजिस हो रही है।

72 वर्षो से ओबीसीको मात्र 5.04 प्रतिशत ही लाभ मिल है जो 52 प्रतिशत है और जो 3.50 प्रतिशत के लोग सत्ता सम्पति संबैधानिक पदों में 90 प्रतिशत आज भी आसीन होने के बाद भी 24 घण्टे में 10 प्रतिशत आरक्षण लागू करके पूरे की हर व्यवस्था में लागू कर दिया गया।

13 पॉइंट जनेऊ रोस्टर लागू करके एससी ओबीसी के लोगो को शिक्षा से वंचित कर दिया गया ओबीसी की जाति गत गणना नही कराई जा रही यहा जानवरो की तो गिनती होती है लेकिन ओबीसी की नही होती । क्यो ऐसा भेदभाव किया जाता है । इन तमाम मुद्दों को लेकर मार्च 2019 में भारत बंद किया गया।


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